वो मुझमे रंग सा घुलता

उस से मैं लड़ता, उस से प्रेम करता
वो मेरे स्वप्नों के तट पर नित्य नाव ले उतरता
उस से मैं कहता कहानियाँ जीवन की, उसके हाथ चूमता
वो मेरे मन को हरता, कागज़ों में कविता बन उभरता
उसे गले लगाकर मिलता दिल को सुकून
काँधे में सिर रखता, गीत सुनाता, सफर सुहाता
वो मेरे रास्ते मशाल से रोशन करता, संग-संग चलता, साँसे भरता

आकाश में बिजलियों सा चमकता
बर्फीले तूफानों में पर्वतों सा सिहरता
वो मेरे आँगन को नित्य कलरव से भरता
चोट लगने पर लहू सा निकलता
औषधि सा जख्मों को भरता
वो मेरे हृदय में पतझड़ सा झड़ता, बसन्त सा खिलता
ठहरे पानी सा रमणीय, आकाश सा गहरा
वो मुझमे पावस की बूंदों सा पड़ता
लहर सा झूमता, रंग सा घुलता

—कवि

©Copyrights

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s