सरोवर ! क्या निश्छल है यह सब

तुझमे दिखती मेरी परछाई
क्या असल है यह गहरायी
पर्वत-शिखर दिखते जो तुझमेँ
सत्तह में जो है चित्रित सब ये
मेघ-मण्डल जो तुझमें समाया
मेरे मन को जिसने लुभाया
सरोवर ! क्या सत्य है यह सब

जाल जो लहरों ने बिखेरा
कीटों का उन्मादित बसेरा
झींगुरो के अज़ल तान
पंछियों के व्याकुल गान
धीमी-धीमी चाहतें बढ़ती
साँसे किसी स्वप्न का ताना-बाना बुनती
सरोवर ! क्या मायाजाल है यह सब

कँचन सी बिखरी सूरज की लाली
सम्मोहित करती साँझ की देह काली
टिमटिमाते अविचल आकाश में तारे
नक्षत्र-चंद्र तेरे नयनों में झाँकते सारे
सुंगन्धित निशा का गूढ़ सँसार
आलिंगन में सिमटे लताओं के हार
सरोवर ! क्या निश्छल है यह सब
…….. कवि

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नॉवेल के पन्नों के बीच तुम्हारी एक तस्वीर

तुम्हारी एक तस्वीर छुपा रखी है
नॉवेल के पन्नों के बीच
कभी-कभार ऐसे ही रख देता था सौ-रुपये का नोट
जब कभी ध्यान जाता है शेल्फ़ पर
किताबों के बीच पड़ी नॉवेल पर
मुस्करा देता हूँ कि तुम पास में ही हो

अखरोट के पेड़ पर बैठ काग
अन्देशा जताता है किसी के आने का
नॉवेल ले बालकॉनी में बैठ देखता रहता हूँ
तुम्हारी तस्वीर और राह को
कभी न मिले तो अफरा-तफरी से पलटता हूँ पन्नों को
पर जब पाता हूँ उठा लाया था दूसरी किताब कोई
आहें भरता हूँ खुद को कहता हूँ बुद्धू

डाल पर बैठी बुलबुल भी हँसती है मुझपर
बुद्धू तो तुम हो ही और डरपोक भी
क्यों डरते हो भला तस्वीर देख-देख क्यूँ मरते हो भला
जो तुम्हारा है ही नहीं उसे खो कैसे सकते हो
यूँ तो गाती अच्छी लगती है मुझे बुलबुल
पर अच्छा नहीं लगता बस यही तराना उसका अट्हास भरा
जिसमें तुम्हें वो कह देती है मुझसे दूर
मैं फिर चुटकी लेता हूँ उसपे
बुलबुल रानी! डाल पर बैठी हो नंगे पाँव
दस्ताने पहन लो ठण्ड से मरोगी एक दिन
नीचे गिर झुरमुट में झाड़ी बन जाओगी
जोर से ठहाके लगाते है फिर
मैं और बाँस में ठकठक करता सुनहरा सुतार
…….. कवि

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एक ख्वाब सा (like a dream)

जब कभी तुम याद आते हो
तब, कुछ पल, जम जाते है बर्फ की तरह
देह सुन्न, रूह एक ख़ामोशी से सिहरती हुयी
मेरी आँखे नहीं कर पाती तोल-मोल
क्या खोया क्या पाया का
बस तुम्हारा चेहरा दीखता है
मुस्कुराते हुए एक ख्वाब सा
तुम्हारे छाती पर सर रखकर
मैं सुनना चाहता हूँ मेरे ख्वाबों की
मासुमियत भरी बातें
जो नाम के साथ नाम जोड़कर सोचते हैं
जैसे प्रेम पूरा हो गया
हाथ थाम कर बैठने को समझते हैं
सबसे खूबसूरत एहसास
जो फूलों से रत्ती-रत्ती मकरन्द लाकर
तुम्हारे लिए लिखी जा रही
किसी ग़ज़ल के छाते में शहद भरते है
संध्या के सूरज में टिमटिमाते सागर में
पूरी आकाशगंगा को देख लेते हैं
किन्तु नहीं सुलझा पाते एक बात
डुब्बे होतें हैं सोच में
कि क्षितिज में हीरे सा चमकता शुक्र तारा
क्यूँ लगता है कम सुन्दर
और तुम्हारी चाँदी की नथुनी क्यूँ लगती है बेहद प्यारी
मेरे ख्वाब जो चुपके से रख देते हैं
तुम्हारी हथेली में हर बार एक फूल
मेरे ख्वाबों को पता नहीं क्यूँ लगता है जताना
तुम्हें बार बार एक ही बात
कि मुझे तुमसे मोहब्बत है

काले बादल आएं हैं
अब बारिश होगी
मेरे पास छाता भी तो नहीं
भीगना पड़ेगा, मेरी मज़बूरी हैं
हाँ लेकिन, मेरी कमज़ोरी नहीं ……… कवि

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मेरी कस्तूरी

मुघ्ध सी लहरों के कलरव में
सरोवर में बनती मिटती धारा सी
रात को पहाड़ों को सर सर करती लोरी सुनाती
मद्धम-मद्धम सी दर्रों में टहलती हवा सी
मरुभूमि सी प्यासी सघन वन सी तृप्त
मेरी कस्तूरी साँझ में महकते चीड़ के जंगल सी

खोल्लों में गूंजती रीत बन गयी बांसुरी की धुनों सी
चरपर करते पथिक के पैरों तले पत्तों सी
नवजीवन की चाह में उड़ान भरते सिंहपर्णी के फूलों सी
नाव की पतवार सी पानी में घुलती जाती
मेरी कस्तूरी तटों में बँधी हुयी नदी सी
सागर की ओर फैलती जाती

हैरी पॉटर की किसी जादुई कहानी के सार सी
बौद्ध भिक्षु के स्व-संसार सी
रात में खाली राह सी
नभ में मेघों के प्रवाह सी
पथिक की मंजिल के प्रति चाह सी
मेरी कस्तूरी रात सी सियाह सी

शिशु सी चंचल और अधीर
दो देशों के बीच सीमा सी, समर सी गंभीर
चींटियों की कतार सी प्रतिबद्ध
संगीत सी नृत्य सी
अमूर्त आकृति सी, कठिन तपस्या सी
मेरी कस्तूरी अपठित लिपि सी रहस्य सी

वन में बिखरी सूरज के किरणों जैसे
तिलिस्म सी मायाजाल सी
मन को छू कर रेखांतर में खो गए कविता के ख्याल सी
स्वासों की लय सी
नयनों की परिधि में डेरा डाले कठिन समय सी
असत्य सी लगती अतीत सी
नज़र झुकाकर कहे खूबसूरत झूठों सी
मेरी कस्तूरी मृग-मरीचिका सी मिथ्या सी। . . . . . . . . . . . . . . कवि

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नदी (river)

नदी कोलाहल तो मुझमें भी है
सन्नाटा सुनाओ
नीरव से भर दो अपनी उछलती लहरों को
व्याकुलता को किनारे कर दो
गूँज में पिरो दो ठहराव के मोती।

नदी किससे रूठी हो
क्यूँ हो गहरे नशे में
एकाकिनी हो क्यूँ बनी
देखो कुसुमों की मण्डली
इनके रंग कितने मोहक
हिम में खड़े अचल
खिल जाते है पाते ही धूप
तुम तो सदैव रहती रूद्र-रूप ;
विमुख हुआ मैं भी हूँ दर्पण से
तुम तो जीवन श्रृंगार सजाओ

इस एकान्त में, खड़ा मैं पुल पर
तुम्हारे उन्माद में खोजता परछाई अपनी
प्रत्यंचा जीवन-धनु की पड़ी है ढीली
मिलकर इसे कसाओ
खींच कर मेरे प्राणो को
गगन-भेदी बाण चलाओ
नदी
भग्नदूत बनने को हर मेघ आतुर
लेकिन है बाकि अब भी मुझमें स्वास
युद्ध मेरा अंतहीन यह
गिरियों को चीरती रणभेरी बजाओ
नदी!  तुम मेरा साहस बढ़ाओ ……. कवि

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स्पर्श

तुम्हें याद है 
जब बरसात में पनपे
हरे-हरे घास को लाँघ कर
तुम एक पहाड़ी की चोटी
में चढ़कर बैठ जाती थी
दूर पहाड़ में गिरते झरने के
सफ़ेद झाग को
धुरी के चंचल पैराहन के
खीसे में भर लेती
फिर उड़ेल देती थी
सुनहरे ओक के जंगल में तुम।

तुम कोसो दूर उस मन्दिर को देखती
तुम्हारा मन उड़ जाता
पँछियों के साथ
उस घण्टी की गूँज तुम्हारे
मन में गूँजती रहती कई देर तक
तुम सम्मोहित होती थी
हिमालय के हुस्न से।

तब मैं आता
बारिश में भीगे घास से एक बूँद उठाकर
तुम्हारी हँसुलीयों में गिरा देता
तुम हिमालय के शिखरों में रौंदती
बिजली सी सिहर उठती
मुड़कर देखती
किसी को न पाती
जब तुम मुझे दूसरी ओर पाती
बारिश में धूप से खिली धार सी
मुस्कुराने लगती
तुम्हारे कान्धे में हलके से हाथ रख देता
और तुम मेरे हाथ पर अपना हाथ रखकर
फिर से सम्मोहित शांति में लौट जाती
हम घण्टो भीगते रहते थे
घनघोर बारिश में
और फिर खड्डों (rivulet) संग परवाहित हो जाते । ……. कवि

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बाँवरे मन में सपनों ने छेड़ी सितार

दास्ताँ एक फूल की
दिन ढले, सूरज डूबे
सब लौटे माँझी, लहर और पतवार
सर्द हवाएँ ठिठुरती नदिया
चाँदनी से सिमटे पत्ते हज़ार
काँपते बारम्बार
लेकिन एक फूल खिला वहीँ का वहीँ
इस फूल के जतन करूँ
घर चल पड़ो
कितनी ठण्ड है बाहर
ऊँगली पकड़ाऊँ खींचे लाऊँ
हाथ जोड़ूँ सदके करूँ
पर माने न मेरे कहे
पर वो माने न मेरे कहे
मारे उठाके पत्थर कंकड़
बड़ी उम्र पर बचकानी अकल
वो आएगी सुबह होते
वो आएगी शाम ढले
राह भूली होंगी पहुँच जाएगी
जब आएगी सौंपना मुझे हँसकर उसको
सूख कर भी लबों पे लिखें होंगे शब्द अनकहे
खिलता उसके लिए बेज़ार उसके लिए
फिजाओं में महक उसके लिए
मौसम उसके लिए बहार उसके लिए
गुँजन उसके लिए कूजन उसके लिए
श्रृंगार उसके लिए गुलाल उसके लिए
कहते चमक उठी उसकी आँखे
जैसे लहरों में हीरे-मोती चमके हज़ार
जैसे उसके बाँवरे मन में सपनों ने छेड़ी सितार

मैं कर रहा अब उसके स्वपन का इन्तजार
वो आए और सौंप दूँ उसे
पूरी हो इस फूल की दास्ताँ
ये फूल
एक फूल
जो बाँध गया मुझे रास्ते से उम्रभर के लिए ……. कवि

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झूठ बोलने से भगवान् बचाए

ढलता सूरज, शान्त होती तट की चहल-पहल
रोशनी डूबती जाती पानी में
आसमान के सुनहरे रंग में घुलता हुआ साँझ का काला रंग
घर लौटते पक्षी और पशु
पक्षियों की चहचहाट मद्धम पड़ती
राह देती रात के सन्नाटे को

कमर झुकाए डण्डे का सहारा ले
कान्धे में लकड़ी का गठड़ा उठाए
घर लौटती बूढ़िया
मुझे कहती थी – किताब बंद करो
इस वक्त शान्त होकर बैठ जाओ
दो युग मिल रहे हैं
दिन और रात
खुद बन कर बैठ जाती थी
पड़ोसिओं की दीवारों के कान
बीच बीच में खाँसकर उनको चेताती कि
वो सब सुन रही है
झूठ बोलने में बूढ़िया माहिर थी
और दिन भर कहती फिरती थी झूठ बोलने से भगवान् बचाए

उसकी अर्थी में वो जब बुद्ध सी शान्त लेटी थी
मैं हँसा था देखकर उसका चेहरा
क्यूँ बूढ़िया!
आज साँझ हो रही है
सूरज ढल रहा है
इसलिए शांत है क्या?
चित्ता में उसके सर में मैंने आखिरी बार हाथ फेरा
थोड़ी देर सहलाया उसकी गोद में सोये बचपन को
फिर
एक भारी लकड़ी रख दी उसकी जांघों में

उसके सच-झूठ जलते रहे चित्ता में बहुत देर
मैं उसके अलाव में देखता रहा ढलते सूरज को
। ……. कवि

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बारिश में फूल

बारिश में फूल
बहूत भीग गए हैं
गिरे है पेड़ों आस-पास
जब तुम नहीं थी बरखा
तो कोई फूल उड़ कर जाता था
सी-शोर तक
सफ़ेद-पीले-लाल-गुलाबी फूल
मैं उठा लेता
उसकी ओर बढ़ा देता
वो फूलों से भी खूबसूरत मुस्कान बिखेर देती
मुस्कुरा कर आँखों को नीची कर लेती
उसकी हया का पराग उड़ता हवा के साथ
उसकी मेहंदी से सज़े हाथों में खिलता वो फूल
पृष्भूमि में थे तुम्हारे काले बादल बरखा

अब मानसून आया है
मेरी बात तुम्हारे कानों में न पड़ी बरखा
बादलों की गर्जना में दब गयी
शब्द भीग गए बह गए फूलों संग
मिल गए समन्दर की लहरों में

लेकिन तुम्हारा फिर भी शुक्रिया
वो बैठी है ऊँचे पत्थर पर आज
नीले-सफ़ेद-काले पैराहन में
बारिश में भीगती हुई
हाथ फैलाए भरती आलिंगन में
बूँद-बूँद संग बादलों को
देखती हथेलिओं में छपाक-छपाक पड़ते हुए बूंदों को
देख रही है
फूलों को और मेरे शब्दों को लहरों में उछलते हुए
कुछ फूल और कुछ शब्द पहुँच जाते हैं
अब भी उस तक
उठा लेती हैं वो हाथों में
लेकिन उसके चेहरे में पड़ी
वो हल्की-हल्की बारिश की बूँदे
मुझे लगती हैं फ़ूलों से भी खूबसूरत
पानी से चुड़ती उसकी काकुलें
जैसे बरसात में भीगे
सह्याद्रि के सघन सुन्दर वन
उसकी हिरन सी आँखों में सावन का प्रतिबिम्ब
मानो सावन खुद को आईने में देख रहा हो

मैं बरखा देख रहा हूँ उसे आँख भर कर

तुम्हारी एक-एक बूँद का शुकरिआ बरखा – कवि

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आज बुद्ध ने ली है करवट सँसार की ओर

कल हिमालय के पर्वत जो डूब गए थे
समुद्र के गहरे तल में
उग गए एक पौधे की तरह
उनके बर्फ़ीले शिखर छूने लगे आकाश को
कल मिली है अंगकोर वट में
समुंद्र मन्थन की एक प्राचीन तस्वीर
और हज़ारों साल पुराने फूलों के अवशेष
कल एफिल टावर
जो भूगोल के ग्लोब से गायब हो चूका था
जादुई तरीके से प्रकट हो गया है पेरिस में
मैं रात को बहुत देर खड़ा रहा उसमें
देखता रहा नक्षत्रों को उसकी आँखों में
कल वो फिर से चौंक कर
देखी है टूटते तारे की ओर

आज बुद्ध ने ली है करवट सँसार की ओर
आज कोयलें, जो श्वेत वस्त्र धारण कर
बन चुकी थी सन्यासिने
जिन्होंने नीरसता की संज्ञा दे दी थी
बाँसुरी और वायलिन के संगीत को
उन्होंने त्याग दिए है अनासक्ति के स्वर
गा रही हैं अलाप
बसन्त राग का
आम के रस में भिगोकर


कल पत्र पहुंच गया है
पहलु-ए-हुस्ना में
कल पाकिस्तान में मनाई गयी है दिवाली
कल उसने मेरा हाथ थामकर
जीवन-पर्यन्त मित्रता का वादा किया है
आज वो निकल गयी है
फिर से पंगारचुल्ला शिखर की ओर
मैं हर बार की तरह इन्तज़ार कर रहा हूँ
उसके आने का …….. कवि

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