वो मुझमे रंग सा घुलता

उस से मैं लड़ता, उस से प्रेम करता
वो मेरे स्वप्नों के तट पर नित्य नाव ले उतरता
उस से मैं कहता कहानियाँ जीवन की, उसके हाथ चूमता
वो मेरे मन को हरता, कागज़ों में कविता बन उभरता
उसे गले लगाकर मिलता दिल को सुकून
काँधे में सिर रखता, गीत सुनाता, सफर सुहाता
वो मेरे रास्ते मशाल से रोशन करता, संग-संग चलता, साँसे भरता

आकाश में बिजलियों सा चमकता
बर्फीले तूफानों में पर्वतों सा सिहरता
वो मेरे आँगन को नित्य कलरव से भरता
चोट लगने पर लहू सा निकलता
औषधि सा जख्मों को भरता
वो मेरे हृदय में पतझड़ सा झड़ता, बसन्त सा खिलता
ठहरे पानी सा रमणीय, आकाश सा गहरा
वो मुझमे पावस की बूंदों सा पड़ता
लहर सा झूमता, रंग सा घुलता

—कवि

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ईज़हार

वो बोलती उसकी सियाही फ़ीकी सी है
दिखाने के लिए मेरे उल्टे हाथ पर
लकीरें खींच कर नदियों का मानचित्र सा बना देती
मैं कुछ कहता तब भी यही कहती
नदियों का मानचित्र है ये, याद कर लो
भूगोल की परीक्षा में काम आएगा
इन दिनों
इन लकीरों सी ही मेरे दिल में कई नदियाँ आ मिलती है
वो जब गाँव के नुक्कड़ में पहुंचती है
जब उसकी सखियाँ मेरे नाम से उसे छेड़ती हैं
और वो खिलखिला कर हँसती है
या तब जब वो अचानक मेरे सामने आकर खड़ी हो जाती है
मेरी आँखों में एकटक देखने लगती है
मन करता उस से कहूं
पहाड़ी पर चढ़ कर चाँद को छूने चलते हैं
सरोवर में मछलियों के संग तैरते हैं
या अपने डैने फैला कर उड़ते बाज़ की तरह
हिमालय से ऊपर उड़ते हैं

फिर एक दिन उसने मुझसे कहा
तुम्हारी सियाही बड़ी गाढ़ी है
मेरे दवात से सियाही लेकर मेरी कॉपी में लिखा
मैं तुमसे प्यार करती हूँ
सुनहरी चमकती नीली सियाही से वो बात लिख दी
जिसे कहते मेरे होंठ नीले पड़ जाते थे
उसके ईज़हार से उठी कम्कम्पी से
मैंने पूरा दवात ही पेज़ पर उल्टा दिया
आह! उसके गुलाबी गालों में छाई वो मुस्कान
एक क्षण में ही मेरे चेहरे में खिल गयी

तुम्हारी ही नदियों से बना सागर है ये
उसने मुझे कसकर गले लगा लिया

मैंने कागज़ सम्भाल कर रखा है.

—कवि

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सूखे पत्तों के नीचे छावं सी सोई हुई

मटमैली सी सुनहरी सी
सहाद्रि की फाल्गुनी घास
ओढ़े हुए यौवन धूप का
वनतृणों में बसी एक रहस्य भरी मनोहर सृष्टि
हो रहा कीटों के आदि-गीतों का गुंजन
सुखी घास और नई पत्तियों की खुश्बू से महकती हवा
गुलमोहर की छाँव बैठा है एक हिरण का जोड़ा
सन्तोष से भरे हुए, सुस्ताते हुए छन्नी धूप सेंकते
झपकी टूटती है तो नयनों से भर लेते हैं प्रेम-अँजुलिया
सूरज की ओट ले देख रहे हैं उनको तारे
गोधूलि में लौट जाएंगे वो घर
आकाश के खालीपन को देंगे तारे भर
रात को जब तुम देखोगी उन्हें टिमटिमाते हुए
वो कह रहें होंगे तुमसे हिरण के जोड़े की प्रेम कहानी
अनगिनत जुबानी
तुम पढ़ना उनके लबों को
पंचगनी के टेबल-टॉप पर लेट कर
यह कहानी जो है
सहाद्रि के पर्णपाती वनों में पलाश सी खिली हुयी
सूखे पत्तों के नीचे छावं सी सोई हुई
कालजयी
सम्पूर्ण
——कवि

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मेरी कस्तूरी

मुघ्ध सी लहरों के कलरव में
सरोवर में बनती मिटती धारा सी
रात को पहाड़ों को सर सर करती लोरी सुनाती
मद्धम-मद्धम सी दर्रों में टहलती हवा सी
मरुभूमि सी प्यासी सघन वन सी तृप्त
मेरी कस्तूरी साँझ में महकते चीड़ के जंगल सी

खोल्लों में गूंजती रीत बन गयी बांसुरी की धुनों सी
चरपर करते पथिक के पैरों तले पत्तों सी
नवजीवन की चाह में उड़ान भरते सिंहपर्णी के फूलों सी
नाव की पतवार सी पानी में घुलती जाती
मेरी कस्तूरी तटों में बँधी हुयी नदी सी
सागर की ओर फैलती जाती

हैरी पॉटर की किसी जादुई कहानी के सार सी
बौद्ध भिक्षु के स्व-संसार सी
रात में खाली राह सी
नभ में मेघों के प्रवाह सी
पथिक की मंजिल के प्रति चाह सी
मेरी कस्तूरी रात सी सियाह सी

शिशु सी चंचल और अधीर
दो देशों के बीच सीमा सी, समर सी गंभीर
चींटियों की कतार सी प्रतिबद्ध
संगीत सी नृत्य सी
अमूर्त आकृति सी, कठिन तपस्या सी
मेरी कस्तूरी अपठित लिपि सी रहस्य सी

वन में बिखरी सूरज के किरणों जैसे
तिलिस्म सी मायाजाल सी
मन को छू कर रेखांतर में खो गए कविता के ख्याल सी
स्वासों की लय सी
नयनों की परिधि में डेरा डाले कठिन समय सी
असत्य सी लगती अतीत सी
नज़र झुकाकर कहे खूबसूरत झूठों सी
मेरी कस्तूरी मृग-मरीचिका सी मिथ्या सी। . . . . . . . . . . . . . . कवि

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नदी (river)

नदी कोलाहल तो मुझमें भी है
सन्नाटा सुनाओ
नीरव से भर दो अपनी उछलती लहरों को
व्याकुलता को किनारे कर दो
गूँज में पिरो दो ठहराव के मोती।

नदी किससे रूठी हो
क्यूँ हो गहरे नशे में
एकाकिनी हो क्यूँ बनी
देखो कुसुमों की मण्डली
इनके रंग कितने मोहक
हिम में खड़े अचल
खिल जाते है पाते ही धूप
तुम तो सदैव रहती रूद्र-रूप ;
विमुख हुआ मैं भी हूँ दर्पण से
तुम तो जीवन श्रृंगार सजाओ

इस एकान्त में, खड़ा मैं पुल पर
तुम्हारे उन्माद में खोजता परछाई अपनी
प्रत्यंचा जीवन-धनु की पड़ी है ढीली
मिलकर इसे कसाओ
खींच कर मेरे प्राणो को
गगन-भेदी बाण चलाओ
नदी
भग्नदूत बनने को हर मेघ आतुर
लेकिन है बाकि अब भी मुझमें स्वास
युद्ध मेरा अंतहीन यह
गिरियों को चीरती रणभेरी बजाओ
नदी!  तुम मेरा साहस बढ़ाओ ……. कवि

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स्पर्श

तुम्हें याद है 
जब बरसात में पनपे
हरे-हरे घास को लाँघ कर
तुम एक पहाड़ी की चोटी
में चढ़कर बैठ जाती थी
दूर पहाड़ में गिरते झरने के
सफ़ेद झाग को
धुरी के चंचल पैराहन के
खीसे में भर लेती
फिर उड़ेल देती थी
सुनहरे ओक के जंगल में तुम।

तुम कोसो दूर उस मन्दिर को देखती
तुम्हारा मन उड़ जाता
पँछियों के साथ
उस घण्टी की गूँज तुम्हारे
मन में गूँजती रहती कई देर तक
तुम सम्मोहित होती थी
हिमालय के हुस्न से।

तब मैं आता
बारिश में भीगे घास से एक बूँद उठाकर
तुम्हारी हँसुलीयों में गिरा देता
तुम हिमालय के शिखरों में रौंदती
बिजली सी सिहर उठती
मुड़कर देखती
किसी को न पाती
जब तुम मुझे दूसरी ओर पाती
बारिश में धूप से खिली धार सी
मुस्कुराने लगती
तुम्हारे कान्धे में हलके से हाथ रख देता
और तुम मेरे हाथ पर अपना हाथ रखकर
फिर से सम्मोहित शांति में लौट जाती
हम घण्टो भीगते रहते थे
घनघोर बारिश में
और फिर खड्डों (rivulet) संग परवाहित हो जाते । ……. कवि

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बाँवरे मन में सपनों ने छेड़ी सितार

दास्ताँ एक फूल की
दिन ढले, सूरज डूबे
सब लौटे माँझी, लहर और पतवार
सर्द हवाएँ ठिठुरती नदिया
चाँदनी से सिमटे पत्ते हज़ार
काँपते बारम्बार
लेकिन एक फूल खिला वहीँ का वहीँ
इस फूल के जतन करूँ
घर चल पड़ो
कितनी ठण्ड है बाहर
ऊँगली पकड़ाऊँ खींचे लाऊँ
हाथ जोड़ूँ सदके करूँ
पर माने न मेरे कहे
पर वो माने न मेरे कहे
मारे उठाके पत्थर कंकड़
बड़ी उम्र पर बचकानी अकल
वो आएगी सुबह होते
वो आएगी शाम ढले
राह भूली होंगी पहुँच जाएगी
जब आएगी सौंपना मुझे हँसकर उसको
सूख कर भी लबों पे लिखें होंगे शब्द अनकहे
खिलता उसके लिए बेज़ार उसके लिए
फिजाओं में महक उसके लिए
मौसम उसके लिए बहार उसके लिए
गुँजन उसके लिए कूजन उसके लिए
श्रृंगार उसके लिए गुलाल उसके लिए
कहते चमक उठी उसकी आँखे
जैसे लहरों में हीरे-मोती चमके हज़ार
जैसे उसके बाँवरे मन में सपनों ने छेड़ी सितार

मैं कर रहा अब उसके स्वपन का इन्तजार
वो आए और सौंप दूँ उसे
पूरी हो इस फूल की दास्ताँ
ये फूल
एक फूल
जो बाँध गया मुझे रास्ते से उम्रभर के लिए ……. कवि

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झूठ बोलने से भगवान् बचाए

ढलता सूरज, शान्त होती तट की चहल-पहल
रोशनी डूबती जाती पानी में
आसमान के सुनहरे रंग में घुलता हुआ साँझ का काला रंग
घर लौटते पक्षी और पशु
पक्षियों की चहचहाट मद्धम पड़ती
राह देती रात के सन्नाटे को

कमर झुकाए डण्डे का सहारा ले
कान्धे में लकड़ी का गठड़ा उठाए
घर लौटती बूढ़िया
मुझे कहती थी – किताब बंद करो
इस वक्त शान्त होकर बैठ जाओ
दो युग मिल रहे हैं
दिन और रात
खुद बन कर बैठ जाती थी
पड़ोसिओं की दीवारों के कान
बीच बीच में खाँसकर उनको चेताती कि
वो सब सुन रही है
झूठ बोलने में बूढ़िया माहिर थी
और दिन भर कहती फिरती थी झूठ बोलने से भगवान् बचाए

उसकी अर्थी में वो जब बुद्ध सी शान्त लेटी थी
मैं हँसा था देखकर उसका चेहरा
क्यूँ बूढ़िया!
आज साँझ हो रही है
सूरज ढल रहा है
इसलिए शांत है क्या?
चित्ता में उसके सर में मैंने आखिरी बार हाथ फेरा
थोड़ी देर सहलाया उसकी गोद में सोये बचपन को
फिर
एक भारी लकड़ी रख दी उसकी जांघों में

उसके सच-झूठ जलते रहे चित्ता में बहुत देर
मैं उसके अलाव में देखता रहा ढलते सूरज को
। ……. कवि

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आज बुद्ध ने ली है करवट सँसार की ओर

कल हिमालय के पर्वत जो डूब गए थे
समुद्र के गहरे तल में
उग गए एक पौधे की तरह
उनके बर्फ़ीले शिखर छूने लगे आकाश को
कल मिली है अंगकोर वट में
समुंद्र मन्थन की एक प्राचीन तस्वीर
और हज़ारों साल पुराने फूलों के अवशेष
कल एफिल टावर
जो भूगोल के ग्लोब से गायब हो चूका था
जादुई तरीके से प्रकट हो गया है पेरिस में
मैं रात को बहुत देर खड़ा रहा उसमें
देखता रहा नक्षत्रों को उसकी आँखों में
कल वो फिर से चौंक कर
देखी है टूटते तारे की ओर

आज बुद्ध ने ली है करवट सँसार की ओर
आज कोयलें, जो श्वेत वस्त्र धारण कर
बन चुकी थी सन्यासिने
जिन्होंने नीरसता की संज्ञा दे दी थी
बाँसुरी और वायलिन के संगीत को
उन्होंने त्याग दिए है अनासक्ति के स्वर
गा रही हैं अलाप
बसन्त राग का
आम के रस में भिगोकर


कल पत्र पहुंच गया है
पहलु-ए-हुस्ना में
कल पाकिस्तान में मनाई गयी है दिवाली
कल उसने मेरा हाथ थामकर
जीवन-पर्यन्त मित्रता का वादा किया है
आज वो निकल गयी है
फिर से पंगारचुल्ला शिखर की ओर
मैं हर बार की तरह इन्तज़ार कर रहा हूँ
उसके आने का …….. कवि

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हिरण से चंचल स्वपन

तुम्हे मैं किसी पीर की दरगाह में मांगी गयी
एक मनोकामना जैसे छोड़ आया था
सोती हुई को, बालों में गुलाब लगाकर
मैं भलीभांति अवगत था कि पीर
मनोकामना को पूरा करने के लिए वचनबद्ध नहीं होते
इसलिए मैं तुम्हें ढूँढने के लिए
अपने बलबूते पर निकल पड़ा हूँ
प्रकृति के लिए तुम्हारी चाह को देख कर
मुझे मालूम है तुम पर्वतों में ही कहीं मिलोगी
शायद तुम भी मुझे ढूंढती हुई
बारिश सी किसी दिशा में निकली होगी
मैं किसी पपीहे की टेर सा
एकरस होकर तुम्हे पुकारूंगा
काफल-पाक्यो पंछी की आवाज़ में आवाज़ मिलाऊँगा
जब हिमालय में फले काफल खाने के लिए
वो तुम्हें बुलाएगा उसी धैर्य के साथ निरंतर
जैसे किसी खड्ड में पत्थर
पानी से धीरे-धीरे घिस जाते है

मेरी लालसाएं कणक का यौवन लेकर जवान होगीं
धान सी दलदल में भी टिकी रहेगी
गेहूँ की बालिया भूरी हो जाती है सूर्य की तपीश से
लेकिन उन्ही तीव्र किरणों को मेरी देह
तुम्हारे केशों की छाँव को याद कर झेल लेगी
मेरे मन के आँगन में तुम खिली रहोगी
किसी जंगल में चरागाहों के बीच में
कई बेनाम फूल ज्योँ खिले रहते हैं
मेरे प्रेम को बाड़ लगाकर बांधे रखूँगा
किसी किसान के प्रयत्न में ढलकर

तुम भी काफल खाने चले आना
तुम भी नदी सी बनकर मुझ पत्थर पर बहते रहना
तुम भी उस सुखद एहसास की कल्पना में बढ़ते रहना
जो चन्दन वृक्ष से सिमटकर किसी भुजंग को मिलता है
तुम्हारे केशों को सवारने के ख़ाब देखता मैं
अगर सो जाऊँ
जब मैं आँखे खोलूँ तो सच में ही
तुम्हारी काकुलों सवारंता मिलूँ
तुमसे मिलकर मेरी ख्वाइशें फिर से जाग जाएगी
जैसे पहली बारिश में छत्रक अँगड़ाई ले जागते हैं

तुम्हें लेकर मेरे स्वप्न किसी हिरण से चंचल हैं
लेकिन ये स्वपन अगर मात्र मृग-मरीचिका भी हो
तुम्हारे न मिलने पर भी
उसी मिठास से तुम्हे बुलाता रहूँगा
जैसे कोयल बुलाती रहती है
बसंत को – कवि

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