वो मुझमे रंग सा घुलता

उस से मैं लड़ता, उस से प्रेम करता
वो मेरे स्वप्नों के तट पर नित्य नाव ले उतरता
उस से मैं कहता कहानियाँ जीवन की, उसके हाथ चूमता
वो मेरे मन को हरता, कागज़ों में कविता बन उभरता
उसे गले लगाकर मिलता दिल को सुकून
काँधे में सिर रखता, गीत सुनाता, सफर सुहाता
वो मेरे रास्ते मशाल से रोशन करता, संग-संग चलता, साँसे भरता

आकाश में बिजलियों सा चमकता
बर्फीले तूफानों में पर्वतों सा सिहरता
वो मेरे आँगन को नित्य कलरव से भरता
चोट लगने पर लहू सा निकलता
औषधि सा जख्मों को भरता
वो मेरे हृदय में पतझड़ सा झड़ता, बसन्त सा खिलता
ठहरे पानी सा रमणीय, आकाश सा गहरा
वो मुझमे पावस की बूंदों सा पड़ता
लहर सा झूमता, रंग सा घुलता

—कवि

©Copyrights

स्पर्श

तुम्हें याद है 
जब बरसात में पनपे
हरे-हरे घास को लाँघ कर
तुम एक पहाड़ी की चोटी
में चढ़कर बैठ जाती थी
दूर पहाड़ में गिरते झरने के
सफ़ेद झाग को
धुरी के चंचल पैराहन के
खीसे में भर लेती
फिर उड़ेल देती थी
सुनहरे ओक के जंगल में तुम।

तुम कोसो दूर उस मन्दिर को देखती
तुम्हारा मन उड़ जाता
पँछियों के साथ
उस घण्टी की गूँज तुम्हारे
मन में गूँजती रहती कई देर तक
तुम सम्मोहित होती थी
हिमालय के हुस्न से।

तब मैं आता
बारिश में भीगे घास से एक बूँद उठाकर
तुम्हारी हँसुलीयों में गिरा देता
तुम हिमालय के शिखरों में रौंदती
बिजली सी सिहर उठती
मुड़कर देखती
किसी को न पाती
जब तुम मुझे दूसरी ओर पाती
बारिश में धूप से खिली धार सी
मुस्कुराने लगती
तुम्हारे कान्धे में हलके से हाथ रख देता
और तुम मेरे हाथ पर अपना हाथ रखकर
फिर से सम्मोहित शांति में लौट जाती
हम घण्टो भीगते रहते थे
घनघोर बारिश में
और फिर खड्डों (rivulet) संग परवाहित हो जाते । ……. कवि

©Copyrights

शुक्र तारा (Venus)

लौट लौटकर आती एक याद
कानों में गूँजती मधुर झंकार
कहती
देखो वह है शुक्र तारा
लालिम में दमकता
सँध्या का पहला हीरा
निशा के कटिबन्ध में जड़ा

कहता मैं उसे
तारे सब एक से
कोई नहीं न्यारा
सब कोई प्यारा  

रह रह लौटती आज उसकी याद
समझी नहीं कभी वो मेरी बात
हरबार खिल उठी वो
सँध्या-तारे का दर्शन पाकर
प्यासा ही रहा मैं
जिसके उनाबी होठों का मधु पीकर
सो जाती तारों को देखते समुद्र-तट पर
सियाह देह पर बिखरे रजत-कण
न भरा कभी उसको निहारते मेरा मन
अप्रतिम जान पड़ती मूर्त बुद्ध की
विराम कर रही हो निर्वाण पाकर

शुक्र तारा आज जान पड़ता है कितना प्यारा
मेरी समृतियों के संसार का केंद्र बिंदु
तम की गहराईयों को भरता
मेरे प्रेम के आकाश को दीप्तिमान करता
मैं बढ़ता इस अनिश्चित यात्रा में इसे ध्रुव मानकर
वह कहीं नहीं होगी यह भी जानकार
क्षितिजों को फैलाता प्रेम स्तुति कर  ……. कवि

©Copyrights

Lost in the infinite surface of oceans

Heart when it beats with a melange of feelings
When a massive avalanche runs down
from a mountain, we are set to climb
Sweeping away everything on the way
Set up in front of us are
the new landscapes on the freshly bruised mountain
New routes to be walked upon
My heart pounding wildly with such feelings
I met her in a dream
near the point where K2 rises
above the confluence of Glaciers.
She held my hand and
we touched the Queen Mountain
for the first time, together
The smile on her face matched the beauty of
the last sunrays kissing the snow-clad Himalayas peaks …
I kissed her forehead
The landscape transformed
like a magical spell into the wild
Silhouetted mountains
blushed pine forests
and a tent set up at the top
of a mountain
Mountain covered with fresh snow
She rested her head on my shoulder
and we looked at the stars for hours
I took her in my arms under the starry sky
inside the tent with an open-top
open to sky
Moonlight was like the dim lamp
its yellow light
permeating inside the little world of ours
its reflection in her eyes
as if moon shining on a deep mysterious lake
she used to sit on the shore in her childhood
She hugged me tightly
I placed my arms around her waist
kissed her on the neck
and slowly moved to her clavicle
Slower than the glacier moves
As my ice-cold lips touched her bosoms
we were falling from an inexplicable high
our naked bodies
in this wild abandon
moving on a rhythm of our breaths
waves crashing into each other
our mortal bodies
floating in deep space
merged with an eternal universe of ecstasy
Traces of her lips
like a snail walking on my chest
Her touches of passionate love
touching the parts of my heart
which never existed before
Her moaning of pain and joy
Her nails digging deep into my back
Marks that can’t be seen
Engraved into my heart
We were lost in the darkness of deep lakes
we were lost in moonlit high mountains
we were lost in the scorching heat of parched deserts
we were lost in the infinite surface of oceans
we made love whole night
In a blink, the dream again transformed
to the peaks breathing snow blizzards
At the peak of the mountain
A flower immortalised to a diamond ring
which I put on her finger
And we flew from the peak
like dry leaves fly on an autumn day
we landed on the ground
like flowers of spring touches the earth — Kavi

©Copyrights

वो बहुत देर तक चुप बैठी रहती है …

वो बहुत देर तक चुप बैठी रहती है
कभी-कभार ही कुछ लफ्ज़ वो कहती है
मैं काफ़ी दिनों से उसको जानता हूँ
अब भी लेकिन रत्ती-भर ही उसको पहचानता हूँ
क्योंकि वो बहुत देर तक चुप बैठी रहती है

आज वो बोलती रही बहुत देर
मैँ हैरान था कहीं पश्चिम से तो न हुयी आज सवेर
वो बोलती गयी
सबसे पहले दादी के गाँव के बारे में
मैंने उसकी झील सी आँखों को
एक बच्ची की व्यग्र आँखों में बसी
गाँव की रहस्य्मयी झील में बदलते देखा
बिसात सी बीछी इस झील में
दादी की कहानीयों का स्पर्श था
वो स्पर्श उसे सफ़ेद साड़ी में गुजरती काया
सर्द-गर्म हवाओं से बंद होते
टी-हाउस के दरवाज़े की खटक में
या किसी सनकी भूत के कदमों के निशानों
से सावधान करता था

वो कूएँ की मुंडेर से झांकते
अपनी आवाज़ की गूंज पर मचलते भाई को
संभल कर कूएँ से दूर ले जाती है
मंदिर में महाकाली की जिव्हा पे बहुत देर तक
हाथ फेर कर वो टीले में भाग जाती है
और दूर बहती नदी की पशाखा बन के बहने लगती है

मैं उसे कहना चाहता था
की आज वो काले पैराहन में
शाम सी खूबसूरत लग रही है
पर मैं उपमाओं में उलझा था
क्योंकि उसका पीला दुप्पटा
रात में चांदनी में दमकते सरसों
के फूलों सा लग रहा था
या हिमालय में दमकती पीली चांदनी सा
पर उसकी आंखे अब भी
उसी झील के न्यौते पर विचार कर रही थी
वो जलपरी सी झील में उतर गयी
और मैं बहूत देर किनारे पर उसका इंतज़ार करता रहा
वो बाहर  आयी और बैठ गयी
मैं कुछ सुनने की चाह से उसे निहारता रहा 
लेकिन
वो बहुत देर तक चुप बैठी रहती है
कभी-कभार ही कुछ लफ्ज़ वो कहती है
मैं काफ़ी दिनों से उसको जानता हूँ
अब भी लेकिन रत्ती-भर ही उसको पहचानता हूँ
क्योंकि वो बहुत देर तक चुप बैठी रहती है  ……. कवि

©Copyrights